मेरे चित्र मेरे शब्द ..........
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नहीं सताते प्रश्न मुझको
क्या हूँ ?कौन हूँ?
कहाँ को जाओंगी
अंत समय जब आएगा
क्या परमात्मा को पा पाऊँगी?
जो हरदम भीतर बैठा मेरे
क्यूँ दर दर खुद को भटकाऊँगी
जब भी साँसे होंगी पूर्ण
गोद में सर रख इसके सो जाओंगी.............
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.....painting is my own copyrite .........
मेरे चित्र मेरे शब्द ..........
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कोमल या कठोर
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हाँ धरा हूँ में
जितनी शख्त नजर आती हूँ
उतनी ही धनि रंग में
लहराती हूँ खिलखिला के
जब सूरज की किरने
बरसती हैं मुझ पे
निर्मल सिर्फ निर्मल करती हैं
भीतर के विचारो को
सीच कर चटका देती हैं
मेरे मन के अवसादों
पे पड़ जाती हैं दरारे
अंकुरित हो उठती हैं
मन की जड़े.....
......................सविता अगरवाल........
.....painting is my own copyrite .........
मेरे चित्र मेरे शब्द .........
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''मैं ओर सिर्फ मैं''
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आंखे जब खुली हो
तो मन के दरवाजे
बंद क्यों हो जाते हैं
शायद आँखे आस पास
के बिम्बों में
उलझ सी जाती हैं
वास्तविकता से दूर हो जाती हैं
क्या देखना चाहती हैं
ओर क्या देखने लग जाती हैं
इसलिए कुछ देर
यूँ ही बेठी हूँ खुद के साथ
आँखे बंद करके
क्युकी खुद को देखना चाहती हूँ
खुद अपनी नजरो से
उन मापदंडो से नही
जो लोगो ने दिए हैं मुझे
खुली आँखों से तो
सूरज भी आँखों में चुभता हैं
चुभन नही रौशनी चाहिए
इसलिए मन का सूरज
रोशन कर रही हूँ
जब अंधकार भीतर हैं
तो सूरज भी भीतर ही
रोशन करना होगा ................savita agarwal
.....painting is my own copyrite .........