Saturday, January 30, 2016

घर के आँगन में
बूढ़े दरख्त की
मजबूत शाखाओ पर
बचपन का झुला
सबको याद आया

एक छोटे से
शीर्षक ने बचपन
के हर खेल को
बारी बारी  याद कराया

सुख में दुःख में
जो था इस आँगन ने
बखूबी साथ निभाया

छन से एक पुरवाई
मुझको भी कही
दूर खीच लायी
कोमल अहसासों
की बगियाँ महकायी

पर मन ने जबसे
तस्वीरो से बात की हैं
आज आचानक आँगन ने
मुझसे एक नयी
मुलाकात की हैं

एक सूनापन उसकी
आँखों में नजर आया हैं
अपनों के बीच जैसे
वो तो  कोई पराया हैं
तभी तो घर की
दहलीज के बाहर
तक ही रहा हैं
उसके वजूद का  साया हैं ...........
...........................शब्द सरिता -सविता
जिस रोज 
शब्द मेरे 
सूख जाए 

तब सम्भव
हो कि
उनमे मेरी
खुश्बू न आए 
तो फिर सीच 
देना इन्हें 
अपने साथ के
अहसास से 
या फिर कर देना
इन्हें मृत घोषित 
और दफना देना
किसी पुरानी किताब में........
............... शब्द सरिता - सविता

Friday, January 29, 2016

सहजता हर रूप में स्वीकार्य हैं ......मेरी रचना का आधार ..
---------------------------------------------------------------
पर्ते सच की
जब खुलने
लगती हैं
सुन्दर सी
तस्वीरे भी
तब धुलने
लगती हैं
आवरण तो


हर चीज पर
नजर आता हैं
आत्मा पर
शरीर का
स्वार्थो पर
विश्वास का
निराशा पर
आशा का
कुरचोगे जो
तो छिल जाओगे .....
सहज ही खोलने दो
सत्य को पिघलने दो ..........


............... शब्द सरिता - सविता

आ चले
...... चाँद के पहलू में 
बैठ कर 
...... चाँद से 
चाँद की बात करते हैं 

...... छुपा रखा है
जिन ख्वाबों को
....... उसने अपनी खामोशी में
उन ख्वाबों से
......... चल करके मुलाकात करते हैं.....
............... शब्द सरिता - सविता

आ भोर को चिड़िया आँगन में चहकती तो होगी
हवायें आँगन में तुम्हारे कुछ देर ठहरती तो होगी
मैं छोड़ आयी थी जिस शाख पर डला एक झुला 
शाख कभी-कभी वो याद में मेरी लहरती तो होगी
सिवाय यादों के मै लायी नही साथ में कुछ भी
बात शायद तुझको ये अब भी अखरती तो होगी
हाँ! नही है ये मुमकिन कि सबको सब मिल जाये
लकीरें हाथों की इन ख्वाहिशों से सिहरती तो होगी
रह गयी थी जो मुलाकातें अधूरी हमारी तुम्हारी
ऐ! वक्त ख्वाब में जिन्दगी तुझमे सवंरती तो होगी
............................ शब्द सरिता - सविता

Thursday, January 28, 2016

ऐ!सितारों
गूंज कर चटको
और फिर बिखर जाओ
इस खामोश रात मे
खातिर चाँद के
कुछ तो शोर मचाओ
मचाओ शोर इतना
कि बिजलियाँ भी
सिहर जाये
नीद के सिरहाने
रख छोङी
गठरी ख्वाबो की
बिखर जाये
हर टूटे ख्वाब के
एक एक जर्रे मे तुम
आफताब नया पाओ
गूंज कर चटको
और फिर बिखर जाओ.....
संगीत......
***********************************
पिरो कर 
लफ्जो को 
जब कोई साज
आवाज करता है 
तो नाच उठती है
गजल कोई
और गीत कोई
परवाज भरता है......
..